Friday, January 1, 2010

2100, Mumbai

हालाते-शौक़ निगाहे-करम ही क्यों न हो
ख़ुश हूँ कि तेरा देखना वहम ही क्यों न हो
(हालाते-शौक़ - दीवानगी की हालत
निगाहे-करम - आँखों का अहसान)


है शौक़ को दीदार की लज्ज़त से वास्ता
जानिब मेरी वो आँख बेरहम ही क्यों न हो
(जानिब - ओर, direction)

ठहरी है जो जल्लाद पे सजदे की तमन्ना
इस शौक़ में गर्दन मेरी कलम ही क्यों न हो
(सजदा - सर झुकाना)

है सर पे अगर तमगा-ए-इल्ज़ाम-ए-मयकशी
कुछ अगर पियूँ कि आब-ए-ज़मज़म ही क्यों न हो
(तमगा-ए-इल्ज़ाम-ए-मयकशी - शराबी होने का इल्ज़ाम)
आब-ए-ज़मज़म - एक पवित्र तालाब का पानी)


रखता नहीं मकसद-ए-इबादत में कोई फ़र्क़
मज़हब तेरा हो या मेरा धरम ही क्यों न हो
(मकसद-ए-इबादत - पूजा-पाठ का मक़सद)

हर हाल में शोला-ए-जिगर को करे ठंडा
तासीर फिर शराब की गरम ही क्यों न हो
(शोला-ए-जिगर - सीने की आग
तासीर - असर)


Sunday, November 8, 2009

ग़म से हर वक़्त की ज़द्दो-ज़हद करते हैं
उम्र का हर हाल लेकिन अहद करते है

उम्र जितनी भी मानिन्दे-नीम रहती हो
तसव्वुर में तेरे इसको शहद करते हैं

Sunday, October 11, 2009

Oct. 2K9, Mumbai
तेरे लहजे में जबकि मेहरबानी न रही
कुछ मेरे भी ज़हन में बदगुमानी न रही

क्या क़यामत हुई गर एक तमन्ना निकली
कि मुझको तमन्ना-ए-ज़िन्दगानी न रही

दौर गुज़रा कि गुज़रे हर नक़्श-ए-ज़िन्दगी
नाज़ था जिस पे बहुत वो जवानी न रही

मंज़र-ए-ग़म सुकूं देने लगे हैं आखिर
अब फ़िराक़-ए-ख़ुशी
कोई भी यानी न रही

वक़्त ने 'गाफ़िल मिज़ाज-ए-आदमी बदला
अब उम्दा शायरी कि कदरदानी न रही

Monday, September 28, 2009

बहुत दिन हुए कुछ लिखे हुए.. दो महीने से बस म्यूजिक बना रहा था..अपना उसूल है एक बार में बस एक ही काम.. अभी दीवान-ए-ग़ालिब पढ़ा तो दिमाग में फिर से शायरी का कीड़ा जाग गया.. मुझे लिखना पसंद है, क्योंकि मैं वही लिखता हूँ जो मैं जीता हूँ.. या यूँ कहिये कि मैं वही जीता हूँ जो मैं लिखता हूँ..करीब दस साल होने को आये कि 'राही' तख़ल्लुस से लिखते हुए. मगर कुछ है ऐसा कि अब इसे बदलना चाहता हूँ.. मेरा नया तख़ल्लुस है - गाफिल, जिसका मतलब है -अनजाना. वैसे तो इसमें ग और फ दोनों में नुक्ता लगता है.. पर यहाँ कई लफ़्जों में नुक्ता नहीं लग पाता, उन गलतियों के लिए माफ़ी चाहता हूँ.. यूँ ही एक नया कलाम

ये कहना बयान-ए-ग़म तर्ज़े-फ़रियाद से
रहता है क्या सुकून उस पर भी दाद से
(बयान-ए-ग़म -- ग़म का हाल
तर्ज़े-फ़रियाद -- फ़रियाद की तर्ज़ पर)


मैं बहार से उकताया हुआ परिन्दा हूँ
कोई मेरी खबर कह दे ज़रा सय्याद से

ग़म से कहीं ज़रा अगर फ़ुर्सत भी रहे
छूटता
उस पर भी नहीं ग़म की याद से

मुझसे कोई गुंजाइश-ए-कलाम न रखियो
लौटा हूँ अभी-अभी बज़्म-ए-बेदाद से
(गुंजाइश-ए-कलाम -- ग़ज़ल की उम्मीद
बज्म-ए-बेदाद -- जिस महफ़िल में कोई दाद न दे)


ये हर घड़ी हशर का तकाज़ा है क्यों कर
कोई पूछे ज़रा तमन्ना-ए-बर्बाद से

उलझन उम्र की हर वक़्त ग़म की बंदिश है
कहने को रहते हैं 'गाफ़िल' आज़ाद से
े

Friday, August 14, 2009

आम ज़बां में जिसको कि फ़साद कहते हैं
चंद दुश्मने-कौम उसे जिहाद कहते हैं

वरना ऐसा भी वो कोई सितमगर नहीं
तक़ाज़ा इश्क़ का है कि सय्याद कहते हैं

कोई उन सरफरोशों को ज़रा आवाज़ दे
ये मुल्क़ अब तलक नहीं आज़ाद कहते हैं

अपनी ही हालतों का कलाम कहता हूँ
ये लोग क्यों मेरे ग़म पे दाद कहते हैं

Aug. 2K9, Mumbai

Wednesday, July 29, 2009

July 2K9, Mumbai
हवाले उस बज़्म के मेरा कलाम कर दे
कोई मेरे हक़ में अगर ये काम कर दे

फ़ितरत-ए- इश्क़ है ज़ुल्म को दुआ देना
या रब मेरी उम्र भी उसके नाम कर दे

बुझ गयी शम्मा-ए-महफ़िल,रात बाकी है
ये पर्दा हटा रोशनी ईनाम कर दे

इस तरह न ले इश्क़ का इम्तिहां आखिर
कि मेरी तन्हाईयाँ लोगो में आम कर दे

दे दे ऐ सितमगर कोई ज़हर मुझको
जो ख़त्म ये उलझन-ओ-ग़म तमाम कर दे

हर वक़्त की रहगुज़र से ऊब चुका हूँ
ख़ुदा इस सफ़र का कोई अंजाम कर दे

होती है ईमान में वो ताक़त 'राही'
फ़रिश्तों को भी इंसां का गुलाम कर दे

Wednesday, July 22, 2009

an old one
न ज़िल्लत है बुरी न ईनाम अच्छा है
जो भी दिल कह दे वही काम अच्छा है

ख़ुद पे कीजिये अगर तो नाज़* कहते हैं
जो गैर से मिले वो ऐहतराम* अच्छा है
(नाज़ - ego, ऐहतराम-honor)
देखिये मुल्क़ की तक़दीर क्या कहती है
लोग कहते तो हैं नया निजाम* अच्छा है
(निजाम-king)
नेकी को सिवा इसके उम्मीद क्या हो
किताबों में लिखा है ये काम अच्छा है

दर्द था जिस्म का कि रूह का क्या कहिये
दम निकलने से मगर आराम अच्छा है

'राही' ये ग़ज़ल ख़ैर कुछ भी नहीं माना
रश्क़ बयां करने को कलाम अच्छा है

Sunday, July 19, 2009

July 2K9, Mumbai
ज़हर में ज़िन्दगी तलाश करता गया
जीने की फ़िक्र में और मरता गया

आगे सफ़र में आराम कहाँ होता
कूए-यार आया तो ठहरता गया

मैंने हर कसम की
निगहबानी* की
वो तमाम वादों से मुकरता गया
(
निगहबानी-care)

शोख़ ने जहाँ ज़ुल्म की अदा पायी
दिन-ब-दिन रंग उसका निखरता गया

मुश्किल हुआ टुकडों को थाम रखना
एक दफा जो टूटा तो बिखरता गया

Tuesday, July 7, 2009

July 2K9, Mumbai
मौका-ए-ज़िन्दगी ये मुश्किलों से मिले
इंसां होना उस पर किस्मतों से मिले

न मस्ज़िद न बुतखाना न गिरजे से वाइज़
कोई सवाब अगर है तो नेकियों से मिले

मिलते हैं गैरतों से तमाम फ़न यहाँ
हुनर-ए-आशिकी मगर ज़िल्लतों से मिले

हम अपने ही ज़मीर के ठुकराए हुए
नज़र उठा के न कभी आइनों से मिले

वो जिनको हासिल राहबर नहीं होता
सलीका-ए-क़दम उन्हें ठोकरों से मिले

जो निकला है 'राही' सफ़र को अकेला
देखिये कि कहाँ तलक काफिलों से मिले

Wednesday, July 1, 2009

an old one
मुमकिन है कुछ ख़बर में रौनक है
नामाबर* की नज़र में रौनक है

रहना चंद बुजुर्ग परिंदों का
बाकी सूखे शजर* में रौनक है

रात दीवाली दिल में अंधियारा
बाकी सारे शहर में रौनक है

रौशनदान के एक घोंसले से
'राही' मेरे घर में रौनक है
************
नामाबर - messanger
शजर - tree

Friday, June 26, 2009

June 2K9, Mumbai
बाए-फनकारी किसी को क्या देते हैं
हम ज़िन्दगी के मर्ज़ की दवा देते हैं

बेसबब है दुश्मन मेरा ज़माना तमाम
मुझे फ़रिश्ते भी वरना दुआ देते हैं

दुश्मनों की दुश्मनी का ऐतबार अच्छा
वक़्त-बेवक्त यार ही दगा देते हैं

उम्मीद-ए-इश्क़ को परवान चढाता हूँ
न जब तलक वो कोई फ़ैसला देते हैं

उसकी मर्ज़ी-ए-तलवार पर गर्दन है
इशारा जहाँ करे सर झुका देते हैं

वहाँ पाँव रक्खूँ जहाँ मुश्किल है ज़्यादा
ये कांटे मुझे मंज़िल का पता देते हैं
June 2K9, Mumbai
न होता वो तो कोई और सितमगर होता
हर हाल में यही मेरा मुक़द्दर होता

आरज़ू और ज़्यादा की कम न होनी थी
वक़्ते-उम्र जिस क़दर भी मयस्सर होता

हुई मुझको कलम की सलाहियत वरना
लहू आँख में और हाथ में ख़ंजर होता

बैठा रहा मुद्दतों सर झुकाए हुए
आंख उठाता वही बेबस मंज़र होता

ये रश्क़ वालों की इनायत है वरना
बज़्म में कलाम मेरा मुक़र्रर* होता

बहता था 'राही' मैं दायम दरिया था
न ठहरा होता अगर तो समंदर होता
* * * * *
मुक़र्रर - once more
दायम - parmanent
June,2K9, Mumbai
न सही खुल के बस ज़रा इशारे में है
वरना हर ग़ज़ल तेरे ही बारे में है

आँख को इन हसीन सूरतों में आखिर
वो लज्ज़त कहाँ जो तेरे नजारे में है

थाम ले अगर हाथ बढा के तो अच्छा
मुझे क्या सुकून वरना किनारे में है

मुझसे सुबह तक रात का वादा है कोई
उम्र जितनी है ख़्वाब के सहारे में है

पाँव ज़मीं पर सही मगर निस्बत मेरी
ज़मीं से दूर फ़लक के सितारे में है

Ghazal - iltajaa, aazmaaish..

June,2K9
इल्तजा, आज़माइश, फ़रियाद सही
बज़्म में और एक ग़ज़ल बे-दाद सही

इश्क़ में फ़रिश्ते सा नज़र आता है
वो फ़ितरतों में अपनी सय्याद सही

कहीं तो आख़िर ये दौर-ए-सितम ठहरे
न सही मुझसे पहले,मेरे बाद सही

ज़मीन की जुस्तजू छूट जायेगी क्या?
परिन्दा ख़ैर उड़ने को आज़ाद सही

Wednesday, June 24, 2009

an old one
किस बात की दुनियां में कोई कमी होती
आदत में ज़माने की जो आवारगी होती

जलते हैं गर सेहरा में तो मर्ज़ी है अपनी
पी लेते समंदर भी अगर तिश्नगी होती

ऐसी फ़ितरत ही नहीं कि ईमान छोड़ दें
वरना ये किसलिए दौर-ए-मुफ़लिसी होती

आये भी वो ज़ालिम तो बे-नक़ाब ही आये
नज़र मैं मिलाता अगर तो खुदकुशी होती

यूँ नहीं कि घबरा गए हों जुल्मो-सितम से
कुछ और भी जी लेते अगर ज़िंदगी होती

Tuesday, June 23, 2009

This one is dedicated to the legend
Sardaar Bhagat Singh

ज़माना ही मैं दूसरा चाहता हूँ
मेरी ज़िद न कहिये कि क्या चाहता हूँ

मुझे ऊबती हैं सूरतें पुरानी
कोई आइना अब नया चाहता हूँ

न जल जाए इसमें ज़माना तो कहना
अभी एक शरर हूँ, हवा चाहता हूँ

है जाना मुझे मर्ज़ की इन्तहां तक
ये किसने कहा है दवा चाहता हूँ

वो हरगिज़ सुनेंगे न मेरी ज़बानी
कोई उनसे कह दे कि क्या चाहता हूँ

यहाँ आरजू-ए-मुआफ़ी किसे है
फ़क़त मैं कोई फ़ैसला चाहता हूँ

जो मरने की हसरत को ये इश्क़ आये
मुझे फिर न देना दुआ चाहता हूँ

ज़मीं के किनारे क़दम जब ये पंहुचें
वहाँ आसमां को झुका चाहता हूँ

जो कहते हो 'राही' बुरा है तो माना
ज़माने का लेकिन भला चाहता हूँ


Monday, June 15, 2009

Ghazal - Ye jo shubah-o-shaam

June,2K9
ये जो सुबह-ओ-शाम बेक़रारी सी है
उम्र पे किस कदर बे-इख्तियारी सी है

ज़माना हुआ कि नशा-ए-इश्क़ गुज़रा
ज़हन को अभी तलक वो खुमारी सी है

जिगर को खून होने का शौक ठहरा है
आँखों को क़ातिल की तलबगारी सी है

जिस्म से वो नाज़ुक सय्याद है फ़ितरत से
सूरत से फ़रिश्ता,नज़र शिकारी सी है

एक तरफ़ तमन्ना दूजी ओर ज़माना
इश्क़ है कि दो नाव की सवारी सी है

रहती है डोर सबकी ख़ुदा के हाथों
उम्र आख़िर तमाशा-ए-मदारी सी है

मुझसे कोई वादा-ए-वफ़ा तो नहीं
'राही' किस उम्मीद पे इंतज़ारी सी है

Sunday, June 14, 2009

Ghazal - wahi ek gila-e-taqdeer mera

June,2K7
वही एक गिला-ए-तक़दीर मेरा
पीटना यूँ पुरानी लकीर मेरा

क़ुफ़्र के हाथ का खिलौना हुआ हूँ
देता है लानत मुझे ज़मीर मेरा

कभी मजनू तो कभी फ़रहाद हो के
पेश करना हर दौर नज़ीर* मेरा

क़ातिल होने से बाज़ आ गया हूँ
चूकना न था वगर्ना* तीर मेरा

खैर ये महज़ मुक़द्दर की बात है
कि बादशाह हुआ है वज़ीर मेरा

बढ़ती गयी जितनी मुफ़लिसी* 'राही'
दिल और होता गया अमीर मेरा
*
नज़ीर - Example
वगर्ना - Otherwise
मुफ़लिसी - Poorness

Sunday, June 7, 2009

Ghazal - ye manzar bebasi ke

ये मंज़र बेबसी के बदल गए होते
साथ दिल के हम भी अगर जल गए होते

ख़ैर कुछ तो सुकून है लड़खडाने में
वरना अभी तलक तो संभल गए होते

तजरबा इश्क़ का तुमको भी हो रहता
चंद मेरे भी अरमां निकल गए होते

ज़रा उनसे ये रश्क़ का कलाम कहना था
कि महफ़िल से किये बे-दख़ल गए होते

हमको अकड़ थी यूँ,कि वो बुलाता ही नहीं
हम वरना 'राही' सर के बल गए होते

Saturday, June 6, 2009

Ghazal - is se pahle ki

इस से पहले कि अपने सफ़र जाऊँगा
देर तक मैं तुझे देख कर जाऊँगा

जबकि मंज़िल नहीं है कोई आँख में
मैं अगर चल भी दूँ तो किधर जाऊँगा

मेरी हस्ती महज़ एक तिनके सी है
रुख़ हवा का जिधर हो उधर जाऊँगा

हो के अँधेरा, सिमटा हुआ सा हूँ
रोशनी बन गया तो बिखर जाऊँगा

ज़र्रे-ज़र्रे में तमाम यादें घुली हैं
छोड़ कर किस तरह ये शहर जाऊँगा

कर रहेगा क़दर ये ज़माना मेरी
वक़्त की ही तरह जब गुज़र जाऊँगा

जानता हूँ हशर इश्क़-ए-नाकाम का
बन के आखिर दुआ,बे-असर जाऊँगा

Ghazal - ab mausame-bahaar ka

अब मौसम-ए-बहार का रस्ता नहीं रखते
इन दिनों कूए-यार का रस्ता नहीं रखते

होने को तो नज़र उसी राहेगुज़र पे है
पर उसके इंतज़ार का रस्ता नहीं रखते

ख्वाबो-ख्याल कहते हैं दीदार भी तेरा
आँखों के ऐतबार का रस्ता नहीं रखते

ज़्यादा ही नाउम्मीद थे,वरना बजाये ख़त
ग़ज़लों के इश्तेहार का रस्ता नहीं रखते

Thursday, June 4, 2009

Ghazal-baat me thoda asar

बात में थोड़ा असर रखते हैं
पास अपने ये हुनर रखते है

दिल का क्या है ऐतबार कोई
आँख में ख़ूने-जिगर रखते हैं

देख के उस हाथ में तलवार को
खुद झुका के अपना सर रखते हैं

आसमां भी क्या बुरा है वरना
अभी तो चलिए कि घर रखते हैं

हाय किसलिए ये ज़माने वाले
हाल पर मेरे नज़र रखते हैं

कैसे कटती है ज़िन्दगी अपनी
हम कहाँ इतनी ख़बर रखते हैं

जब से देखा है गिरेबान अपना
बड़ी शर्मिन्दा नज़र रखते हैं

न कहिये गुज़रती है क्या इन दिनों
बस कि मुश्किल से गुज़र रखते हैं

क्या बताएं हाल-ए-बम्बई 'राही'
खैर बस इतनी, कि बसर रखते हैं

Wednesday, June 3, 2009

Ghazal-9- n ho sake achchha koi..

न हो सके अच्छा कोई तो ख़राब क्यों रहे
ग़म-ए-इश्क़ को आरज़ू-ए-शराब क्यों रहे

हो दिल में ही अगर लहू होने की हसरत
ज़ख्मों की तादाद का फिर हिसाब क्यों रहे

भेजा नहीं अब तलक पैगामे-सवाल मैंने
यूँ फिर भी इंतजारी-ए-जवाब क्यों रहे

मेरे सिवा रखे मेरी रहगुज़र का ख़्याल
'राही' कोई मुझसा खाना-ख़राब क्यों रहे

Tuesday, June 2, 2009

Ghazal-8-tere zimme..

तेरे जिम्मे खयाल-ए-रहगुज़र मेरा
कुछ तो आसां कर खुदाया सफ़र मेरा

न दे ज़बां साथ,बहाना कान का सही
हर बात पे कहना ये मुक़र्रर* मेरा

मेरी मर्ज़ी पे ज़माने की किस्मत है
गैर के हाथ है लेकिन मुक़द्दर मेरा

ऐसी मजाल मेरी? कि छू भी सकूं
हो रहे भी अगर वो सितमगर मेरा

शिकवा-ए-यार को ख़ैर फ़ुरसत नहीं
ज़ालिम है जबकि पहले नामाबर मेरा

मज़हब कई,हों जैसे मुख्तलिफ़* दरिया
जंग पे अड़े हुए, कि समंदर मेरा

*मुक़र्रर - I beg your pardon?
मुख्तलिफ़ - Different-Different

ghazal-7-zamaane bhar me

ज़माने भर में जिनके इश्तेहार निकले
वो लोग ही ज्यादा इज्ज़तदार निकले

जबकि हमको ही तलब करता था ज़माना
किबला हम भी किसी के तलबगार निकले

ज़हमत-ए-तन्हाई से उकता सा गया हूँ
अब निकले तमन्ना, तो सरे-बाज़ार निकले

वो न हो काश, आरज़ू जिसकी होती है
इश्क़ सचमुच न कहीं गुनहगार निकले

यूँ चुप रहा तो रश्क़ ही मार डालेगा
जो बोलूँ मगर तो उसकी तलवार निकले

लहर-ए-ज़िन्दगानी का मायना क्या है
उम्र को डूबना है जहाँ पार निकले

इश्क़ में हस्ती-
ए-जिस्म को रोइए क्या
जबकि दिल ही ज़ुल्म का तरफ़दार निकले

क्या कसम थी न गए जो मयक़दे 'राही'
वरना उस रस्ते हम कई बार निकले

Ghazall-6-Bayaane dard..

बयान-ए-दर्द मसीहा को समझा सकूं
वो हालत नहीं कि ज़बां से बतला सकूं

इस से पहले कि तमाशा-ए-उम्र गुज़रे
काश उम्मीद-ए-ज़िन्दगी आज़मा सकूं

वो इतनी देर तो ठहरे मेरे सामने
कि बोलने से पहले ज़रा घबरा सकूं

नाउम्मीदियाँ हद से गुज़रने लगी हैं
इस हाल में जहाँ तलक भी निभा सकूं

मुफ़्त यहाँ मौत भी नहीं मिलती 'राही'
तंगदस्ती* कि हाय ज़हर भी न खा सकूं

*तंगदस्ती - Poorness

Monday, June 1, 2009

Ghazal-5- n rahi ummid-e-qaraar zyaada

न रही उम्मीद-ए-क़रार ज़्यादा
किया है हद से इंतज़ार ज़्यादा

वक़्त की चाल सुस्त-दर-सुस्त है
जबकि तमन्ना की रफ़्तार ज़्यादा

या रब तेरे जहान में किसलिए
अमन कम है और तक़रार ज़्यादा

ज़माना बड़ा ख़राब है 'राही'
रहा कीजिये होशियार ज़्यादा