2100, Mumbai
हालाते-शौक़ निगाहे-करम ही क्यों न हो
ख़ुश हूँ कि तेरा देखना वहम ही क्यों न हो
(हालाते-शौक़ - दीवानगी की हालत
निगाहे-करम - आँखों का अहसान)
है शौक़ को दीदार की लज्ज़त से वास्ता
जानिब मेरी वो आँख बेरहम ही क्यों न हो
(जानिब - ओर, direction)
ठहरी है जो जल्लाद पे सजदे की तमन्ना
इस शौक़ में गर्दन मेरी कलम ही क्यों न हो
(सजदा - सर झुकाना)
है सर पे अगर तमगा-ए-इल्ज़ाम-ए-मयकशी
कुछ अगर पियूँ कि आब-ए-ज़मज़म ही क्यों न हो
(तमगा-ए-इल्ज़ाम-ए-मयकशी - शराबी होने का इल्ज़ाम)
आब-ए-ज़मज़म - एक पवित्र तालाब का पानी)
रखता नहीं मकसद-ए-इबादत में कोई फ़र्क़
मज़हब तेरा हो या मेरा धरम ही क्यों न हो
(मकसद-ए-इबादत - पूजा-पाठ का मक़सद)
हर हाल में शोला-ए-जिगर को करे ठंडा
तासीर फिर शराब की गरम ही क्यों न हो
(शोला-ए-जिगर - सीने की आग
तासीर - असर)
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago
