इस से पहले कि अपने सफ़र जाऊँगा
देर तक मैं तुझे देख कर जाऊँगा
जबकि मंज़िल नहीं है कोई आँख में
मैं अगर चल भी दूँ तो किधर जाऊँगा
मेरी हस्ती महज़ एक तिनके सी है
रुख़ हवा का जिधर हो उधर जाऊँगा
हो के अँधेरा, सिमटा हुआ सा हूँ
रोशनी बन गया तो बिखर जाऊँगा
ज़र्रे-ज़र्रे में तमाम यादें घुली हैं
छोड़ कर किस तरह ये शहर जाऊँगा
कर रहेगा क़दर ये ज़माना मेरी
वक़्त की ही तरह जब गुज़र जाऊँगा
जानता हूँ हशर इश्क़-ए-नाकाम का
बन के आखिर दुआ,बे-असर जाऊँगा
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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