Tuesday, June 2, 2009

ghazal-7-zamaane bhar me

ज़माने भर में जिनके इश्तेहार निकले
वो लोग ही ज्यादा इज्ज़तदार निकले

जबकि हमको ही तलब करता था ज़माना
किबला हम भी किसी के तलबगार निकले

ज़हमत-ए-तन्हाई से उकता सा गया हूँ
अब निकले तमन्ना, तो सरे-बाज़ार निकले

वो न हो काश, आरज़ू जिसकी होती है
इश्क़ सचमुच न कहीं गुनहगार निकले

यूँ चुप रहा तो रश्क़ ही मार डालेगा
जो बोलूँ मगर तो उसकी तलवार निकले

लहर-ए-ज़िन्दगानी का मायना क्या है
उम्र को डूबना है जहाँ पार निकले

इश्क़ में हस्ती-
ए-जिस्म को रोइए क्या
जबकि दिल ही ज़ुल्म का तरफ़दार निकले

क्या कसम थी न गए जो मयक़दे 'राही'
वरना उस रस्ते हम कई बार निकले

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