ज़माने भर में जिनके इश्तेहार निकले
वो लोग ही ज्यादा इज्ज़तदार निकले
जबकि हमको ही तलब करता था ज़माना
किबला हम भी किसी के तलबगार निकले
ज़हमत-ए-तन्हाई से उकता सा गया हूँ
अब निकले तमन्ना, तो सरे-बाज़ार निकले
वो न हो काश, आरज़ू जिसकी होती है
इश्क़ सचमुच न कहीं गुनहगार निकले
यूँ चुप रहा तो रश्क़ ही मार डालेगा
जो बोलूँ मगर तो उसकी तलवार निकले
लहर-ए-ज़िन्दगानी का मायना क्या है
उम्र को डूबना है जहाँ पार निकले
इश्क़ में हस्ती-ए-जिस्म को रोइए क्या
जबकि दिल ही ज़ुल्म का तरफ़दार निकले
क्या कसम थी न गए जो मयक़दे 'राही'
वरना उस रस्ते हम कई बार निकले
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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