अब मौसम-ए-बहार का रस्ता नहीं रखते
इन दिनों कूए-यार का रस्ता नहीं रखते
होने को तो नज़र उसी राहेगुज़र पे है
पर उसके इंतज़ार का रस्ता नहीं रखते
ख्वाबो-ख्याल कहते हैं दीदार भी तेरा
आँखों के ऐतबार का रस्ता नहीं रखते
ज़्यादा ही नाउम्मीद थे,वरना बजाये ख़त
ग़ज़लों के इश्तेहार का रस्ता नहीं रखते
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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