Saturday, June 6, 2009

Ghazal - ab mausame-bahaar ka

अब मौसम-ए-बहार का रस्ता नहीं रखते
इन दिनों कूए-यार का रस्ता नहीं रखते

होने को तो नज़र उसी राहेगुज़र पे है
पर उसके इंतज़ार का रस्ता नहीं रखते

ख्वाबो-ख्याल कहते हैं दीदार भी तेरा
आँखों के ऐतबार का रस्ता नहीं रखते

ज़्यादा ही नाउम्मीद थे,वरना बजाये ख़त
ग़ज़लों के इश्तेहार का रस्ता नहीं रखते

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