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न सही खुल के बस ज़रा इशारे में है
वरना हर ग़ज़ल तेरे ही बारे में है
आँख को इन हसीन सूरतों में आखिर
वो लज्ज़त कहाँ जो तेरे नजारे में है
थाम ले अगर हाथ बढा के तो अच्छा
मुझे क्या सुकून वरना किनारे में है
मुझसे सुबह तक रात का वादा है कोई
उम्र जितनी है ख़्वाब के सहारे में है
पाँव ज़मीं पर सही मगर निस्बत मेरी
ज़मीं से दूर फ़लक के सितारे में है
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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