Friday, June 26, 2009

June,2K9, Mumbai
न सही खुल के बस ज़रा इशारे में है
वरना हर ग़ज़ल तेरे ही बारे में है

आँख को इन हसीन सूरतों में आखिर
वो लज्ज़त कहाँ जो तेरे नजारे में है

थाम ले अगर हाथ बढा के तो अच्छा
मुझे क्या सुकून वरना किनारे में है

मुझसे सुबह तक रात का वादा है कोई
उम्र जितनी है ख़्वाब के सहारे में है

पाँव ज़मीं पर सही मगर निस्बत मेरी
ज़मीं से दूर फ़लक के सितारे में है

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