बात में थोड़ा असर रखते हैं
पास अपने ये हुनर रखते है
दिल का क्या है ऐतबार कोई
आँख में ख़ूने-जिगर रखते हैं
देख के उस हाथ में तलवार को
खुद झुका के अपना सर रखते हैं
आसमां भी क्या बुरा है वरना
अभी तो चलिए कि घर रखते हैं
हाय किसलिए ये ज़माने वाले
हाल पर मेरे नज़र रखते हैं
कैसे कटती है ज़िन्दगी अपनी
हम कहाँ इतनी ख़बर रखते हैं
जब से देखा है गिरेबान अपना
बड़ी शर्मिन्दा नज़र रखते हैं
न कहिये गुज़रती है क्या इन दिनों
बस कि मुश्किल से गुज़र रखते हैं
क्या बताएं हाल-ए-बम्बई 'राही'
खैर बस इतनी, कि बसर रखते हैं
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
-
आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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