Friday, January 1, 2010

2100, Mumbai

हालाते-शौक़ निगाहे-करम ही क्यों न हो
ख़ुश हूँ कि तेरा देखना वहम ही क्यों न हो
(हालाते-शौक़ - दीवानगी की हालत
निगाहे-करम - आँखों का अहसान)


है शौक़ को दीदार की लज्ज़त से वास्ता
जानिब मेरी वो आँख बेरहम ही क्यों न हो
(जानिब - ओर, direction)

ठहरी है जो जल्लाद पे सजदे की तमन्ना
इस शौक़ में गर्दन मेरी कलम ही क्यों न हो
(सजदा - सर झुकाना)

है सर पे अगर तमगा-ए-इल्ज़ाम-ए-मयकशी
कुछ अगर पियूँ कि आब-ए-ज़मज़म ही क्यों न हो
(तमगा-ए-इल्ज़ाम-ए-मयकशी - शराबी होने का इल्ज़ाम)
आब-ए-ज़मज़म - एक पवित्र तालाब का पानी)


रखता नहीं मकसद-ए-इबादत में कोई फ़र्क़
मज़हब तेरा हो या मेरा धरम ही क्यों न हो
(मकसद-ए-इबादत - पूजा-पाठ का मक़सद)

हर हाल में शोला-ए-जिगर को करे ठंडा
तासीर फिर शराब की गरम ही क्यों न हो
(शोला-ए-जिगर - सीने की आग
तासीर - असर)


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