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तेरे लहजे में जबकि मेहरबानी न रही
कुछ मेरे भी ज़हन में बदगुमानी न रही
क्या क़यामत हुई गर एक तमन्ना निकली
कि मुझको तमन्ना-ए-ज़िन्दगानी न रही
दौर गुज़रा कि गुज़रे हर नक़्श-ए-ज़िन्दगी
नाज़ था जिस पे बहुत वो जवानी न रही
मंज़र-ए-ग़म सुकूं देने लगे हैं आखिर
अब फ़िराक़-ए-ख़ुशी कोई भी यानी न रही
वक़्त ने 'गाफ़िल मिज़ाज-ए-आदमी बदला
अब उम्दा शायरी कि कदरदानी न रही
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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