Tuesday, July 7, 2009

July 2K9, Mumbai
मौका-ए-ज़िन्दगी ये मुश्किलों से मिले
इंसां होना उस पर किस्मतों से मिले

न मस्ज़िद न बुतखाना न गिरजे से वाइज़
कोई सवाब अगर है तो नेकियों से मिले

मिलते हैं गैरतों से तमाम फ़न यहाँ
हुनर-ए-आशिकी मगर ज़िल्लतों से मिले

हम अपने ही ज़मीर के ठुकराए हुए
नज़र उठा के न कभी आइनों से मिले

वो जिनको हासिल राहबर नहीं होता
सलीका-ए-क़दम उन्हें ठोकरों से मिले

जो निकला है 'राही' सफ़र को अकेला
देखिये कि कहाँ तलक काफिलों से मिले

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