July 2K9, Mumbai
मौका-ए-ज़िन्दगी ये मुश्किलों से मिले
इंसां होना उस पर किस्मतों से मिले
न मस्ज़िद न बुतखाना न गिरजे से वाइज़
कोई सवाब अगर है तो नेकियों से मिले
मिलते हैं गैरतों से तमाम फ़न यहाँ
हुनर-ए-आशिकी मगर ज़िल्लतों से मिले
हम अपने ही ज़मीर के ठुकराए हुए
नज़र उठा के न कभी आइनों से मिले
वो जिनको हासिल राहबर नहीं होता
सलीका-ए-क़दम उन्हें ठोकरों से मिले
जो निकला है 'राही' सफ़र को अकेला
देखिये कि कहाँ तलक काफिलों से मिले
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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