तेरे जिम्मे खयाल-ए-रहगुज़र मेरा
कुछ तो आसां कर खुदाया सफ़र मेरा
न दे ज़बां साथ,बहाना कान का सही
हर बात पे कहना ये मुक़र्रर* मेरा
मेरी मर्ज़ी पे ज़माने की किस्मत है
गैर के हाथ है लेकिन मुक़द्दर मेरा
ऐसी मजाल मेरी? कि छू भी सकूं
हो रहे भी अगर वो सितमगर मेरा
शिकवा-ए-यार को ख़ैर फ़ुरसत नहीं
ज़ालिम है जबकि पहले नामाबर मेरा
मज़हब कई,हों जैसे मुख्तलिफ़* दरिया
जंग पे अड़े हुए, कि समंदर मेरा
*मुक़र्रर - I beg your pardon?
मुख्तलिफ़ - Different-Different
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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