Tuesday, June 2, 2009

Ghazal-8-tere zimme..

तेरे जिम्मे खयाल-ए-रहगुज़र मेरा
कुछ तो आसां कर खुदाया सफ़र मेरा

न दे ज़बां साथ,बहाना कान का सही
हर बात पे कहना ये मुक़र्रर* मेरा

मेरी मर्ज़ी पे ज़माने की किस्मत है
गैर के हाथ है लेकिन मुक़द्दर मेरा

ऐसी मजाल मेरी? कि छू भी सकूं
हो रहे भी अगर वो सितमगर मेरा

शिकवा-ए-यार को ख़ैर फ़ुरसत नहीं
ज़ालिम है जबकि पहले नामाबर मेरा

मज़हब कई,हों जैसे मुख्तलिफ़* दरिया
जंग पे अड़े हुए, कि समंदर मेरा

*मुक़र्रर - I beg your pardon?
मुख्तलिफ़ - Different-Different

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