बहुत दिन हुए कुछ लिखे हुए.. दो महीने से बस म्यूजिक बना रहा था..अपना उसूल है एक बार में बस एक ही काम.. अभी दीवान-ए-ग़ालिब पढ़ा तो दिमाग में फिर से शायरी का कीड़ा जाग गया.. मुझे लिखना पसंद है, क्योंकि मैं वही लिखता हूँ जो मैं जीता हूँ.. या यूँ कहिये कि मैं वही जीता हूँ जो मैं लिखता हूँ..करीब दस साल होने को आये कि 'राही' तख़ल्लुस से लिखते हुए. मगर कुछ है ऐसा कि अब इसे बदलना चाहता हूँ.. मेरा नया तख़ल्लुस है - गाफिल, जिसका मतलब है -अनजाना. वैसे तो इसमें ग और फ दोनों में नुक्ता लगता है.. पर यहाँ कई लफ़्जों में नुक्ता नहीं लग पाता, उन गलतियों के लिए माफ़ी चाहता हूँ.. यूँ ही एक नया कलाम
ये कहना बयान-ए-ग़म तर्ज़े-फ़रियाद से
रहता है क्या सुकून उस पर भी दाद से
(बयान-ए-ग़म -- ग़म का हाल
तर्ज़े-फ़रियाद -- फ़रियाद की तर्ज़ पर)
मैं बहार से उकताया हुआ परिन्दा हूँ
कोई मेरी खबर कह दे ज़रा सय्याद से
ग़म से कहीं ज़रा अगर फ़ुर्सत भी रहे
छूटता उस पर भी नहीं ग़म की याद से
मुझसे कोई गुंजाइश-ए-कलाम न रखियो
लौटा हूँ अभी-अभी बज़्म-ए-बेदाद से
(गुंजाइश-ए-कलाम -- ग़ज़ल की उम्मीद
बज्म-ए-बेदाद -- जिस महफ़िल में कोई दाद न दे)
ये हर घड़ी हशर का तकाज़ा है क्यों कर
कोई पूछे ज़रा तमन्ना-ए-बर्बाद से
उलझन उम्र की हर वक़्त ग़म की बंदिश है
कहने को रहते हैं 'गाफ़िल' आज़ाद से े
ये कहना बयान-ए-ग़म तर्ज़े-फ़रियाद से
रहता है क्या सुकून उस पर भी दाद से
(बयान-ए-ग़म -- ग़म का हाल
तर्ज़े-फ़रियाद -- फ़रियाद की तर्ज़ पर)
मैं बहार से उकताया हुआ परिन्दा हूँ
कोई मेरी खबर कह दे ज़रा सय्याद से
ग़म से कहीं ज़रा अगर फ़ुर्सत भी रहे
छूटता उस पर भी नहीं ग़म की याद से
मुझसे कोई गुंजाइश-ए-कलाम न रखियो
लौटा हूँ अभी-अभी बज़्म-ए-बेदाद से
(गुंजाइश-ए-कलाम -- ग़ज़ल की उम्मीद
बज्म-ए-बेदाद -- जिस महफ़िल में कोई दाद न दे)
ये हर घड़ी हशर का तकाज़ा है क्यों कर
कोई पूछे ज़रा तमन्ना-ए-बर्बाद से
उलझन उम्र की हर वक़्त ग़म की बंदिश है
कहने को रहते हैं 'गाफ़िल' आज़ाद से े

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