ये मंज़र बेबसी के बदल गए होते
साथ दिल के हम भी अगर जल गए होते
ख़ैर कुछ तो सुकून है लड़खडाने में
वरना अभी तलक तो संभल गए होते
तजरबा इश्क़ का तुमको भी हो रहता
चंद मेरे भी अरमां निकल गए होते
ज़रा उनसे ये रश्क़ का कलाम कहना था
कि महफ़िल से किये बे-दख़ल गए होते
हमको अकड़ थी यूँ,कि वो बुलाता ही नहीं
हम वरना 'राही' सर के बल गए होते
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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