an old one
किस बात की दुनियां में कोई कमी होती
आदत में ज़माने की जो आवारगी होती
जलते हैं गर सेहरा में तो मर्ज़ी है अपनी
पी लेते समंदर भी अगर तिश्नगी होती
ऐसी फ़ितरत ही नहीं कि ईमान छोड़ दें
वरना ये किसलिए दौर-ए-मुफ़लिसी होती
आये भी वो ज़ालिम तो बे-नक़ाब ही आये
नज़र मैं मिलाता अगर तो खुदकुशी होती
यूँ नहीं कि घबरा गए हों जुल्मो-सितम से
कुछ और भी जी लेते अगर ज़िंदगी होती
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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