June,2K9
इल्तजा, आज़माइश, फ़रियाद सहीबज़्म में और एक ग़ज़ल बे-दाद सही
इश्क़ में फ़रिश्ते सा नज़र आता है
वो फ़ितरतों में अपनी सय्याद सही
कहीं तो आख़िर ये दौर-ए-सितम ठहरे
न सही मुझसे पहले,मेरे बाद सही
ज़मीन की जुस्तजू छूट जायेगी क्या?
परिन्दा ख़ैर उड़ने को आज़ाद सही

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