Sunday, July 19, 2009

July 2K9, Mumbai
ज़हर में ज़िन्दगी तलाश करता गया
जीने की फ़िक्र में और मरता गया

आगे सफ़र में आराम कहाँ होता
कूए-यार आया तो ठहरता गया

मैंने हर कसम की
निगहबानी* की
वो तमाम वादों से मुकरता गया
(
निगहबानी-care)

शोख़ ने जहाँ ज़ुल्म की अदा पायी
दिन-ब-दिन रंग उसका निखरता गया

मुश्किल हुआ टुकडों को थाम रखना
एक दफा जो टूटा तो बिखरता गया

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