July 2K9, Mumbai
ज़हर में ज़िन्दगी तलाश करता गया
जीने की फ़िक्र में और मरता गया
आगे सफ़र में आराम कहाँ होता
कूए-यार आया तो ठहरता गया
मैंने हर कसम की निगहबानी* की
वो तमाम वादों से मुकरता गया
(निगहबानी-care)
शोख़ ने जहाँ ज़ुल्म की अदा पायी
दिन-ब-दिन रंग उसका निखरता गया
मुश्किल हुआ टुकडों को थाम रखना
एक दफा जो टूटा तो बिखरता गया
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
-
आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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