आम ज़बां में जिसको कि फ़साद कहते हैं
चंद दुश्मने-कौम उसे जिहाद कहते हैं
वरना ऐसा भी वो कोई सितमगर नहीं
तक़ाज़ा इश्क़ का है कि सय्याद कहते हैं
कोई उन सरफरोशों को ज़रा आवाज़ दे
ये मुल्क़ अब तलक नहीं आज़ाद कहते हैं
अपनी ही हालतों का कलाम कहता हूँ
ये लोग क्यों मेरे ग़म पे दाद कहते हैं
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ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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