न हो सके अच्छा कोई तो ख़राब क्यों रहे
ग़म-ए-इश्क़ को आरज़ू-ए-शराब क्यों रहे
हो दिल में ही अगर लहू होने की हसरत
ज़ख्मों की तादाद का फिर हिसाब क्यों रहे
भेजा नहीं अब तलक पैगामे-सवाल मैंने
यूँ फिर भी इंतजारी-ए-जवाब क्यों रहे
मेरे सिवा रखे मेरी रहगुज़र का ख़्याल
'राही' कोई मुझसा खाना-ख़राब क्यों रहे
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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