Monday, June 1, 2009

Ghazal-5- n rahi ummid-e-qaraar zyaada

न रही उम्मीद-ए-क़रार ज़्यादा
किया है हद से इंतज़ार ज़्यादा

वक़्त की चाल सुस्त-दर-सुस्त है
जबकि तमन्ना की रफ़्तार ज़्यादा

या रब तेरे जहान में किसलिए
अमन कम है और तक़रार ज़्यादा

ज़माना बड़ा ख़राब है 'राही'
रहा कीजिये होशियार ज़्यादा

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