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उम्र को कोई उम्मीद-ए-आसरा तक नहीं
यानी हमारे होंठ पर अब दुआ तक नहीं?
मैं रखता तो हूँ उसकी खैरियत-ए-ख़ुशी
जिसको मेरा मुद्दा-ए-ग़म पता तक नहीं
आँख को उसके दीदार का तक़ाज़ा होना
इश्क़ को चाहिए जो,वो सिलसिला तक नहीं
हम उस रिश्ता-ए-मंज़िल को इतराते हैं
जिसमें मयस्सर है वरना रास्ता तक नहीं
कहने को जी रहे हैं मुद्दतों से 'राही'
अहसास-ए-ज़िन्दगी वरना हुआ तक नहीं
सब्र-ए-आशिक़ी उम्र तक आज़माना आखिर
दुआ के असर को चाहिए ज़माना आखिर
या रब तेरे जहान में किस क़दर मुश्किल है
आदमी का आदमी के काम आना आखिर
इससे पहले कि ये तमाशा -ए-इश्क़ गुज़रे
मियाद-ए-उम्र को है गुज़र जाना आखिर
तसल्ली-ए-अदावत* भी होने नहीं देता
तेरा ये इज्ज़तों से पेश आना आखिर
उम्र को बेबसी की कोई इन्तहां क्या है
लमहा-लमहा फिर साँस लिए जाना आखिर
वही मैं, वही ग़म और वही दर-ए-तमन्ना
वास्ते सुकून के वही मयखाना आखिर
'राही' मिज़ाज-ए-अमन की बात करते-करते
कह डाला मैंने रंज का तराना आख़िर
*अदावत - Enmity
गर्मी-ए-जिगर से समंदर उबाल सकते
ज़माने को दिखा हम ये कमाल सकते
जो बाज़ आता जिगर खोदने से नाखून
सेहरा में एक दरिया हम निकाल सकते
न मिलनी थी वो सूरत किसी और शह में
ख़ाक-ए-क़ायनात भी अगर खगाल सकते
मिल ही रहती कोई फ़िराक़-ए-इश्क़ वाइज़
ज़रा देर ही सही, क़यामत टाल सकते
महफ़िल-ए-हुस्न को अदब का तकाज़ा है
तो क्या एक जुमला भी नहीं उछाल सकते
न होनी थी फ़िक़्र-ए-ख़ुशी इस क़दर 'राही'
हम काश कि ग़म ही अपना संभाल सकते
दम-ब-दम किसी ग़म की फिराक रखता हूँ
मुसलसल किसी की राह ताक रखता हूँ
सीने में रक्खी थी कभी शरर मैंने
अब ये है ख्वाहिशों की ख़ाक रखता हूँ
कब मुझसे दिल में रंज संभाला जाए
कहना हो जो भी वो तपाक रखता हूँ
सलामती-ए-हस्ती को जितनी चाहिए
जिस्म को महज़ उतनी खुराक रखता हूँ
ग़म-ए-ज़िन्दगी का मारा हुआ हूँ 'राही'
लबों पे खैर हरदम मज़ाक रखता हूँ
नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने
मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज़्ब-ए-दिल
उसपे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आये न बने
गैर फिरता है लिए यूँ तेरे ख़त को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाये न बने
इस नज़ाक़त का बुरा हो,वो भले हैं तो क्या
हाथ आयें तो उन्हें हाथ लगाये न बने
खेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाय
काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने
मौत की राह न देखूं कि बिन आये न रहे
तुमको चाहूँ अगर आओ तो बुलाए न बने
इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
जो लगाए न लगे और बुझाए न बने
--Mirza Ghalib
उसकी हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूं
ढूँढने उसको चला हूँ जिसे पा भी न सकूं
मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूं
डाल कर ख़ाक मेरे खून पे ये क़ातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूं
जोफ* में ताना-ए-अगयार* का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूं
ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या कसम है तेरे मिलने की कि खा भी न सकूं
-- Mirza Ghalib
* ज़ोफ़ - Weakness, Poorness
अगयार - enemy