दम-ब-दम किसी ग़म की फिराक रखता हूँ
मुसलसल किसी की राह ताक रखता हूँ
सीने में रक्खी थी कभी शरर मैंने
अब ये है ख्वाहिशों की ख़ाक रखता हूँ
कब मुझसे दिल में रंज संभाला जाए
कहना हो जो भी वो तपाक रखता हूँ
सलामती-ए-हस्ती को जितनी चाहिए
जिस्म को महज़ उतनी खुराक रखता हूँ
ग़म-ए-ज़िन्दगी का मारा हुआ हूँ 'राही'
लबों पे खैर हरदम मज़ाक रखता हूँ
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago
