नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने
मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज़्ब-ए-दिल
उसपे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आये न बने
गैर फिरता है लिए यूँ तेरे ख़त को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाये न बने
इस नज़ाक़त का बुरा हो,वो भले हैं तो क्या
हाथ आयें तो उन्हें हाथ लगाये न बने
खेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाय
काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने
मौत की राह न देखूं कि बिन आये न रहे
तुमको चाहूँ अगर आओ तो बुलाए न बने
इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
जो लगाए न लगे और बुझाए न बने
--Mirza Ghalib
उसकी हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूं
ढूँढने उसको चला हूँ जिसे पा भी न सकूं
मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूं
डाल कर ख़ाक मेरे खून पे ये क़ातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूं
जोफ* में ताना-ए-अगयार* का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूं
ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या कसम है तेरे मिलने की कि खा भी न सकूं
-- Mirza Ghalib
* ज़ोफ़ - Weakness, Poorness
अगयार - enemy
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
-
आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

No comments:
Post a Comment