Monday, June 1, 2009

Ghazal-4 umr ko koi

उम्र को कोई उम्मीद-ए-आसरा तक नहीं
यानी हमारे होंठ पर अब दुआ तक नहीं?

मैं रखता तो हूँ उसकी खैरियत-ए-ख़ुशी
जिसको मेरा मुद्दा-ए-ग़म पता तक नहीं

आँख को उसके दीदार का तक़ाज़ा होना
इश्क़ को चाहिए जो,वो सिलसिला तक नहीं

हम उस रिश्ता-ए-मंज़िल को इतराते हैं
जिसमें मयस्सर है वरना रास्ता तक नहीं

कहने को जी रहे हैं
मुद्दतों से 'राही'
अहसास-ए-ज़िन्दगी वरना हुआ तक नहीं

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