गर्मी-ए-जिगर से समंदर उबाल सकते
ज़माने को दिखा हम ये कमाल सकते
जो बाज़ आता जिगर खोदने से नाखून
सेहरा में एक दरिया हम निकाल सकते
न मिलनी थी वो सूरत किसी और शह में
ख़ाक-ए-क़ायनात भी अगर खगाल सकते
मिल ही रहती कोई फ़िराक़-ए-इश्क़ वाइज़
ज़रा देर ही सही, क़यामत टाल सकते
महफ़िल-ए-हुस्न को अदब का तकाज़ा है
तो क्या एक जुमला भी नहीं उछाल सकते
न होनी थी फ़िक़्र-ए-ख़ुशी इस क़दर 'राही'
हम काश कि ग़म ही अपना संभाल सकते
ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
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आँखों में फ़रयाद नहीं है
यानी दिल बर्बाद नहीं है
मुझ को छोड़ गई है गुमसुम
ये तो तेरी याद नहीं है
तुम बिन मुरझाये से हम हैं
जैसे पानी खाद नहीं है
इस लम्हे...
9 years ago

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