Saturday, May 30, 2009

ghazal-2 garmi-e-jigar se...

गर्मी-ए-जिगर से समंदर उबाल सकते
ज़माने को दिखा हम ये कमाल सकते

जो बाज़ आता जिगर खोदने से नाखून
सेहरा में एक दरिया हम निकाल सकते

न मिलनी थी वो सूरत किसी और शह में
ख़ाक-ए-क़ायनात भी अगर खगाल सकते

मिल ही रहती कोई फ़िराक़-ए-इश्क़ वाइज़
ज़रा देर ही सही, क़यामत टाल सकते

महफ़िल-ए-हुस्न को अदब का तकाज़ा है
तो क्या एक जुमला भी नहीं उछाल सकते

न होनी थी फ़िक़्र-ए-ख़ुशी इस क़दर 'राही'
हम काश कि ग़म ही अपना संभाल सकते

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